कल्पना करो कि, एक घोड़ा बहुत तेज दौड़ सकता है, इसीलिए आपको लगता है, कि घोड़ा केवल दौड़ लगाने के लिए है, सवारी करने के लिए है, क्योंकि उससे बाकी दूसरे काम की अपेक्षा नहीं। लेकिन मैं कहूं कि यही समान काम की अपेक्षा आप अपने बच्चों से भी कर रहे हैं, कि वो भी शिक्षा और नौकरी की दौड़ में दौड़ता चला जाए, जबकि इंसान बहुत से काम कर सकता है। ना शिक्षा गलत है, ना नौकरी लेकिन आपने एक सुंदर बगीचा तो बना लिया, लेकिन फूल तो एक ही तरह के उगाए, उन फूलों का आप बाजार में व्यापार तो कर सकते हैं, लेकिन बगीचा खूबसूरत नहीं बना सकते। इसलिए डिग्री सर्टिफिकेट बिकती है, जबकि स्किल्स सीखनी पड़ती है।
आपको क्या लगता है? आप शिक्षा क्यों लेते हैं? सिर्फ नौकरी के लिए? या डिग्री के लिए, या सच में सोचने और समझने की क्षमता विकसित करने के लिए? शिक्षा आपको कन्वेंस करती है, कि किसी का विरोध ना करना ही सभ्य रहना है। एक अच्छा और आज्ञाकारी बच्चा वही जो सब की बात माने, क्योंकि शिक्षित व्यक्ति एक अच्छा एम्प्लोयी बन जाता है, पर शायद स्वतंत्र नहीं, इसलिए शादी जैसे बड़े फैसले भी आपके पेरेंट्स ही ले रहे हैं।
स्कूल हमें इनफार्मेशन देता है, लेकिन सोचने की कला नहीं सिखाता। शिक्षा का ढाँचा इस तरह बनाया गया है, कि आप एक अच्छे फॉलोवर बने, आज्ञाकारी बने, “मुक्त विचारक” फ्री थिंकर नहीं। इसलिए पढ़ाई आपको उत्तर रटवाती है, जबकि वास्तविक शिक्षा सवाल उठाती है।
एथेंस में 2500 साल पहले, पहली ऐतिहासिक घटना घटी, जहां लोगों के मान्यता पर प्रश्न पूछने के कारण एक शिक्षक को मार दिया गया। क्या था सुकरात का अपराध? लोगों को यह सिखाना कि—‘सवाल पूछना डर से बड़ा होता है।’ आज आप इतने स्कूलों और कॉलेजों से गुजरते हैं, लेकिन क्या आप वही सीख पा रहे हैं? जिसे सिखाने के कारण सुकरात को ज़हर का प्याला पीना पड़ा? क्या आपने सच में पढ़ाई सीखी, या सिर्फ परीक्षा पास करना?
शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ जानकारी भरना नहीं, बल्कि अपने भीतर के ज्ञान का दिया जलाना है। पर हमारी कक्षाएँ और समाज हमारे भीतर ज्ञान का दिया नहीं जलाती, मानसिक आग लगा देती है। ‘कॉम्पिटिशन’, ऐसे बच्चों के बीच में, जिनमें एक सिर्फ पढ़ाई जानता है, जबकि दूसरा आर्ट जानता है। कॉम्पिटिशन किसका? सिर्फ अच्छे मार्क्स लाने का, जहां कॉम्पिटिशन ना fair है, ना रीजनेबल। समाज अच्छे मार्क्स लाने वाले को एप्रिशिएट करती है, और कम मार्क्स लाने वाले को कमजोर बताती है। जहां निराश और परेशान बच्चे के लिए शिक्षा एक भार है, इसलिए तो एजुकेशन सेक्टर मल्टी बिलियन डॉलर का व्यापार है।
हर साल हज़ारों डिग्री सर्टिफिकेट्स बेची और खरीदी जाती है, भारत के हर एक स्टेट में, दुनिया के हर एक देश में, ऐसे कई यूनिवर्सिटीज है, पता सब को है, बोलना कोई नहीं चाहता और खरीदे क्यों न? आपने कागज की डिग्री को ज्यादा महत्व दिया, बजाय योग्यता और कौशल के। सबसे बड़ी विडंबना- जो मिडिल क्लास एजुकेशन सिस्टम को सबसे खराब और भ्रष्ट बोलती है, वही सबसे बड़ी खरीददार है। तो क्या आज आप वाकई में शिक्षित हो रहे हैं? या सिर्फ सर्टिफिकेट इकट्ठा कर रहे हैं?
पुराने समय की बात करूँ तो 19वीं सदी में यूरोप में शिक्षा का उद्देश्य फैक्ट्री के लिए मज़दूर तैयार करना था। गुलाम देश जैसे इंडिया, अफ्रीका में आजादी से पहले शिक्षा का उद्देश्य लो ग्रेड कर्मचारियों का एक वर्ग तैयार करना था, जो कम सैलरी में काम करें। सीधे शब्दों में कहूँ तो अंग्रेज आपको एक अच्छा क्लर्क बनाना चाहती थी, जिसकी लिखावट अच्छी हो, ताकि रिकार्ड सही से नोट हो सकें। आप हिसाब किताब जैसे जोड़ना, घटाना, गुणा, भाग कर सके और समय-समय पर सरकार को जरूरी एप्लीकेशन और लेटर लिख दिया करें। जिसका कहीं न कहीं आज के शिक्षा में असर दिखता है। जबकि खराब लिखावट का अर्थ ये नहीं की आपको जानकारी नहीं, या आप इंटेलिजेंट नहीं और मैथ्स तो जोड़ने-घटाने से कहीं आगे है। सच कहूँ तो 19वीं सदी में हालत बहुत खराब थी।
लेकिन आज? आपके बच्चे के स्कूल बैग में किताबें नहीं, बल्कि एग्जाम का बोझ है, मन में स्वतंत्रता नहीं, भविष्य का भय है, ऐसा डर जो बच्चे के मानसिक संतुलन ही हिला देती है। नौकरी न मिलने का डर, कम मार्क्स आ जाने का डर, दूसरों से पीछे रह जाने का डर, जबकि असल शिक्षा आपके मन में स्वतंत्रता पैदा करती है, बोझ कम करता है, डर हटा देता है। लेकिन वर्तमान की शिक्षा स्ट्रेस बढ़ा देता है और आपको लगता है, आपका बच्चा पढ़ तो रहा है, बिना ज्ञान के अच्छे ग्रेड ला रहा है। पर आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, कि सिस्टम बच्चों को ज़िंदगी के लिए तैयार कर रही हैं या सिर्फ एक प्रोसेस में ढाल रही हैं?
मैं अपनी बात बताऊँ तो मैं कोई एक्सपर्ट नहीं, मुझे एक बार क्लास से बाहर निकाल दिया था, मुझे आज भी याद है, 8वीं कक्षा का वो दिन, क्योंकि मुझे टीचर के सवालों के जवाब नहीं आता था और टीचर को मेरे। मेरा सवाल टीचर के लिए इम्पोर्टेन्ट नहीं था, न सिलेबस में था? पर मेरे लिए मेरे प्रश्न का उत्तर जरूरी था और टीचर के लिए उनका और जैसे कि मैंने बताया, कि मुझे आंसर नहीं आता था, क्योंकि मेरे पास पढ़ने का कोई उद्देश्य नहीं था, इसलिए उस वक्त मुझे पढ़ाई में कोई इंटरेस्ट भी नहीं था। पनिशमेंट तो मुझे स्वीकार था, पर वास्तव में टीचर ने क्या किया? मुझे यह कहकर चुप करा दिया, कि मेरी इन बेतुकी सवालों और मेरे फालतू सोच का कोई भविष्य नहीं। उन्होंने मेरे सवाल पूछने की जिज्ञासा, सिलेबस में ही दफन कर दी। आज सालों बाद मेरी जिज्ञासा मुझे यहाँ वापस खींच ले आई, जहां से मैंने सवाल करना शुरू किया था।
तो शिक्षा क्या है? शिक्षा नौकरी की मशीन है, परीक्षा बुद्धिमत्ता का पैमाना है, और रटना समझने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। जबकि परीक्षा आधारित शिक्षा वास्तविक जीवन कौशल नहीं सिखाती। समाज के इस विपरीत धारणा के कारण ही, स्वतंत्र सोच का जन्म लेना मुश्किल हो जाता है। इतिहास ने भी यही गलती की, बहुत से धार्मिक साम्राज्य ने शिक्षा पर नियंत्रण रखा, क्योंकि सोचने और सवाल पूछने वाले लोगो से उनका साम्राज्य कांप जाता था। चाहे वह गैलीलियो हो, मंसूर अल हल्लाज हो या हो राजा राममोहन राय, आखिरकार समाज उन्हे खतरा मान ही लेता है।
लेकिन आज शिक्षा को बेहतर करने के लिए, आपको अपने बच्चों को सोचने की आजादी और प्रश्न करने की आजादी देना, एक मात्र उपाय है। बच्चों को अंधविश्वास और मिसइन्फॉर्मेशन से दूर रखना होगा। यदि तुम सूर्य के रोशनी से डरोगे और छुपते रहोगे तो एक दिन, रोशनी क्या है, तुम यह भी भूल जाओगे। बच्चों को रोशनी बिखेरने दो, उजाला हो जाने दो, सच से डरो मत, सामना करो। एक दिन अंधकार खत्म होने से सब कुछ साफ, स्वच्छ और सुंदर नजर आने लगेगा। जैसे सुबह हो जाने पर ब्यूटी ऑफ नेचर स्पष्ट नजर आ जाती है।
शिक्षा केवल किताबी या बाहरी ज्ञान नहीं है, शिक्षा मनुष्य के भीतर का आंतरिक अनुभव है, जीवन भर चलने वाली एक व्यापक और निरंतर प्रक्रिया है, अपूर्ण से पूर्ण बनाने की प्रक्रिया। आपको समझना होगा, शिक्षा का उद्देश्य डिग्री नहीं, दृष्टि है। और दृष्टि तब जन्म लेती है, जब हम यह पूछने का साहस करते हैं— “मैं जो जानता हूँ, वह जानने योग्य क्यों है?”